Thursday, November 23, 2017

I'm alright...

I'm happy, I'm lost
Lost in the paradise
Nothing to wonder
Nothing to ponder
I'm all in all, I'm alright

You know what you did to me
While I was intensely asleep...
You made me feel I'm not alone
Walking beneath the burning sun

Yes, I was in noman's land
Plucking the moon with bare hands
Having touch of the eyes with
The glittering skies, strange!!

Yes, I was aloof indeed
But you gave me that heavenly chariot
Yes, I was burning with the heat
And you brought me under the magical fleet

I will wake up today or tomorrow
And may hold your hand for the move
Yes, you are right, you are blessings
For the bar, my heavenly bar

I'll hold your hand again for that day
The day, that marks
Prosperity for the self
The day, that marks
Prosperity for the nation
The day, the concept of war and strategy
Will be lost to that idiot box
And remain confined to the
Age old cherished chessboard game

With Love
Prabhat Kumar

Sunday, October 1, 2017

क्या वक्त बताएगा हमको?


(A non-traditional poem which talks about the inefficiency of time in certain exceptional cases, sorry, no reasoning, just enjoy the poem :) )

क्या वक्त बताएगा हमको?
हम वक्त के यु पाबंद नहीं। 
फिर भी कुछ बातें होती है। 
इन वक्त से हमको द्वन्द नहीं। 

कभी वह मेरे हाथों में हो,
कभी हम कठपुतली होते हैं। 
इन वक्त की यारों मार लगी 
तो मत्स्य भी तितली होते हैं। 

क्या वक्त बताएगा हमको?
हम वक्त के यु पाबंद नहीं। 

इन वक्त की भांति स्मृतियाँ भी 
उन दर्पण की भांति होती है,
जो आ जाये गर पास कभी तो 
वक्त अलंकृत हो जाती है। 

ख्यालों में ख्याल आया जब 
वक्त में उलझा सवाल आया तब 
क्यों हमको वक्त नाकारा है 
या हमने वक्त को मारा है। 

लो करलो अब स्वीकार यही 
ऐ वक्त ! करो इकरार अभी। 
तू सोच रहा मैं अचल अडिग 
पर कैसे करूँ मैं इंकार अभी। 

ऐ वक्त समंदर चलने दे,
लहरों पे मस्ती आती है। 
डूबेगी नौका क्या अपनी 
मदिरा से शक्ति आती है। 

कुछ खेल-खेल में वक्त ढले 
और उषा की आभा झलके। 
मैं उपवन में बाग को निरखूँगा 
औ तन,मन,धन से सींचूँगा !

ऐ वक्त ! न तू इतरा इतना। 
अब तेरा वक्त भी आएगा। 
पीने वाले होवेंगे मदहोश,
और पल में तू सो जायेगा !!

क्या वक्त बताएगा हमको?
हम वक्त के यु पाबंद नहीं।।

Author: Prabhat Kumar

Monday, July 24, 2017

काश्मीर के दिव्य शिखर पर एक तिरंगा प्यारा है।

धरती पर जो स्वर्ग सुनहरा 
वो घाटी मुरझाई है। 
दशकों से जो खून की होली 
खेल-खेल थर्राई है। 

उस घाटी का वर्णन कैसे 
करता पी के प्याले से,
काश्मीर की आग बुझेगी 
जाने कौन निवाले से। 

भारत माँ का आँचल है ये 
पुरखों की सम्पत्ती है। 
काश्मीर कोई कर्ज नहीं है 
जन-जन की अभिव्यक्ति है। 

जब आतंकी तोड़ सुरक्षा 
काश्मीर में घुस जाते हैं,
तंग जिहादी, विकृत मंशा 
बच्चो में भी बो जाते हैं। 

युवा-युवा का मन घबराता
हिन्दू-मुश्लिम फर्क कराता,
बंदूकें और गोला-बारी 
मानो इनका कर्म जताता। 

घायल हुआ है ऐसे जीवन 
कइअक मर्म फ़सानों से। 
और सुरक्षा कर्मी की भी  
बलिदान के बाणों से। 

काश्मीर जो सदियों से इस 
हीम के आँचल में चमके। 
शिव के शिर्ष से गंगा निकले     
मट्टी भी पावन महके।  

उस कश्मीर पर पे कोई देश 
सेना का जोर लगा भी दे,
पहले सरबत, दूध पीला 
पीछे खंजर दिखला भी दे। 

हम मानवता के पुजारी है 
और हक़ के पूर्ण अधिकारी है। 
देश भक्त हम नहीं डिगेंगे,
हर हरकत को दल देंगे। 

और युद्ध जो हुआ कभी भी,
सर्व-राष्ट्र को हक़ में लेकर। 
बिना किसी परमाणु परिक्षण 
पूर्ण काश्मीर गह लेंगे। 

किसी से कैसा दुर्विवाद क्यों 
ना करते किसी पर हम प्रहार,
आजा भाई कोई देश तू 
करना हमको, बस व्यापार !!

काश्मीर के मुश्लिम भाई 
अपने कोई गैर नहीं हैं। 
और वहां के पूज्य पुजारी से 
हमको कोई बैर नहीं है। 

कैसा भी शाशक होगा,
बस हिंदुस्तान हमारा है। 
काश्मीर के दिव्य शिखर पर 
एक तिरंगा प्यारा है। 

-- anonymous

Saturday, June 17, 2017

You came, in my life, Wedding Anniversary Poem 2010-2017

I was lost in the plot of illusion
Crafted by the self-induction
And marked by the evolution

You came, in my life
The day was so bright
The love took its own pace 
Submerged in the mystery of the light

Sparkled within the brightness of the dark
Few songs, I sang to impress you
And you denied the longevity of dwarf dictation
Instead, you took care of me with serious sensation
I guess, no words can explain the theme

Longer we live together,
The more we will walk towards the holy bar,
The more we will scratch the wall for fun, 
The more we will break the silence to run,
The more we’ll soothe the haunted Halloween 
Or the trauma of farmers detained from the bar.

Just know that the world's a stage and 
We've to play as many roles as the broken way
Watch, Listen, Learn the Dogma, of the human race
Work, Teach, Earn the Grace, of the human race
Live life smartly and burn the calories indeed
Not by exercises but by busy-ness or the business

Business that enriches the world
Business that enriches our world
Business that means to our dad and mom
A Business which is certified by democracy
The deemed democracy of the human race…

-->
n  Prabhat Kumar

Monday, April 17, 2017

Oh my lord...

Oh, my Lord... you're lost I know
Still, I'll sought your name to show
You are the reason for the war and the peace
Monster of slavery and spiritual flee

The wisdom of knowledge is yet another responsibility
I want to fly without stupidity, with lifelong longevity
No more I will sought, still, will touch your conscience
I'll touch the sky while hovering over my motherland, I'll fly...

Oh, my Lord... you're lost I know
But I am opaque, visible to all
I'll jump and I'll not fall, I'll fly
Give me that mammoth task that you can't imply...

Author: Prabhat Kumar

Tuesday, April 4, 2017

जीवन एक किनारा है या एक समंदर का दर्पण

जीवन एक किनारा है या एक समंदर का दर्पण 
पल में रंग में रंग जाते जाने कइअक प्यासे गण!

कुछ तुम सेकुछ हम सेकुछ इन दीवारों से,

महक उठी है लीला अपनी पनघट के फौवारों से। 


मुझको कोई मोह नहीं, काव्य कृत्य काव्यालय से 
बिक सकता है अपना बोल किसी मर्म के प्याले से
मुझसे कोई आश न रखना, मैं बंजर हूँ, मैं बंजारा!
मुझ पर रख ली आश जो तो मैं उर्वर हूँ, मैं संसारा!!

भुला नहीं में अपनी बस्तीना भुला अरमानों को 

मटकी में जो घोल रखी है नेक बुलंद इरादों को 

कोई समझे नीले नयन से मेरा ह्रदय एक सागर है 

कोई समझे नदी की भांतिकोई समझे गागर है!


चिंतामुक्त गर हुआ कभी तो चिंता इसकी होती थी 

कौन कौन से तोडूं रिस्ताभक्ति कभी  खोती थी।

सबकी अपनी-अपनी बस्तीमेरा एक व्यापार है... 

क्या जमींक्या आसमानकंधे पर अथाह भार है


Author: Prabhat Kumar

I'm lost in myself

If I'm lost in myself
Don't thy call me selfish,
I'm wet and withdrawn within
Walking beneath the ocean
No clue, I have
Where I'm gone
I'm lost but I'm here 
Beneath the vast ocean 
May pop up again and again 
On mere dialings of my name

Yes, I'm lost in myself
In the colours of heaven 
In the dullness of earth
Seeking empathy for the sorrow
Burning red for the nature's blow
Miracle, I know, is all way round
The visibility is yet to surround
Once, I'll reach there alive
And connect the boundless sky

-- Prabhat Kumar

I'm alright...

I'm happy, I'm lost Lost in the paradise Nothing to wonder Nothing to ponder I'm all in all, I'm alright You...